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गत तीन वर्षों के दौरान 39.44 लाख लोगों को प्रदान की गई मुफ्त कानूनी सेवाएं : अर्जुन राम मेघवाल

Mochan Samachaar Desk by Mochan Samachaar Desk
03/04/2025
in देश
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आगामी 1 जुलाई से होंगे नए आपराधिक कानून प्रभावी : केंद्रीय कानून मंत्री
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नयी दिल्‍ली : विधायी विभाग को भारत सरकार के संबंधित प्रशासनिक मंत्रालयों/विभाग द्वारा लिए गए नीतिगत निर्णय के आधार पर तथा भारत सरकार के संसदीय प्रक्रिया नियमावली में संसदीय कार्य मंत्रालय द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार कानूनों का मसौदा तैयार करने का कार्य सौंपा गया है।

विधायी विभाग यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम उठा रहा है कि विधायी प्रारूपण सरल, सादा, सटीक और सुस्पष्ट हो। विधायी प्रारूपण और अनुसंधान संस्थान विधायी प्रारूपण में प्रशिक्षण प्रदान करता है, जिसका उद्देश्य विधानों को सरल/सुगम भाषा में तैयार करना है, ताकि इसे आम जनता के लिए सुलभ बनाया जा सके।

अनुपालन के ऐसे बोझ को कम करने, कानूनी प्रणाली में सुधार लाने और इसे आम लोगों के लिए अधिक सुलभ बनाने के भारत सरकार के संकल्प के हिस्से के रूप में, अब तक विभिन्न निरसन और संशोधन अधिनियमों के माध्यम से कुल 1562 अप्रचलित और अनावश्यक कानूनों को निरस्त किया जा चुका है।   

भारतीय विधि आयोग को देश के कानूनों की समीक्षा करने और उनमें सुधार के सुझाव देने का भी अधिकार दिया गया है। दिनांक 2 सितंबर, 2024 की अधिसूचना के अनुसार, भारत के तेईसवें विधि आयोग का गठन किया गया था, जिसका कार्य अन्य बातों के साथ-साथ उन कानूनों की पहचान करना था जिनकी अब आवश्यकता नहीं है या जो प्रासंगिक नहीं हैं और जिन्हें तुरंत निरस्त किया जा सकता है, लैंगिक समानता को बढ़ावा देने के लिए मौजूदा कानूनों की जांच करना और उनमें संशोधन का सुझाव देना तथा सामान्य महत्व के केंद्रीय अधिनियमों को संशोधित करना ताकि उन्हें सरल बनाया जा सके और विसंगतियों, अस्पष्टताओं और असमानताओं को दूर किया जा सके।

विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के तहत राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण का गठन किया गया था, जिसका उद्देश्य विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 की धारा 12 के अंतर्गत आने वाले लाभार्थियों सहित समाज के कमजोर वर्गों को मुफ्त और सक्षम कानूनी सेवाएं प्रदान करना है। यह अधिनियम यह सुनिश्चित करता है कि आर्थिक या अन्य अक्षमताओं के कारण किसी भी नागरिक को न्याय प्राप्त करने के अवसरों से वंचित न किया जाए और विवादों के सौहार्दपूर्ण समाधान के लिए लोक अदालतों का आयोजन किया जाए।

इसके अलावा, राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण ने निवारक और रणनीतिक कानूनी सेवा कार्यक्रमों के कार्यान्वयन के लिए विभिन्न योजनाएं भी तैयार की हैं, जिन्हें विधिक सेवा प्राधिकरणों द्वारा विभिन्न स्तरों यानी राज्य, जिला और तालुका स्तर पर कार्यान्वित किया जाता है। पिछले तीन वर्षों 2022-23 से 2024-25 (दिसंबर 2024 तक) के दौरान 39.44 लाख लोगों को मुफ्त कानूनी सेवाएं प्रदान की गई हैं।

सरकार 250 करोड़ रुपये के परिव्यय से पांच वर्ष (2021-2026) की अवधि के लिए “भारत में न्याय तक समग्र पहुंच के लिए अभिनव समाधान तैयार करना” (दिशा) नामक एक केंद्रीय क्षेत्र योजना भी लागू कर रही है।

दिशा योजना का उद्देश्य टेली-लॉ, न्याय बंधु (प्रो बोनो लीगल सर्विसेज) और कानूनी साक्षरता एवं कानूनी जागरूकता कार्यक्रम के माध्यम से कानूनी सेवाओं की आसान, सुलभ, सस्ती और नागरिक-केंद्रित डिलीवरी प्रदान करना है। दिशा योजना के तहत, टेली-लॉ नागरिकों को मुकदमे-पूर्व सलाह देने के लिए मोबाइल ऐप “टेली-लॉ” और टोल-फ्री नंबर के माध्यम से वकीलों से जोड़ता है, न्याय बंधु (प्रो बोनो सर्विसेज) पंजीकृत लाभार्थियों को अदालतों में मुफ्त कानूनी प्रतिनिधित्व प्राप्त करने की सुविधा प्रदान करता है और कानूनी साक्षरता एवं कानूनी जागरूकता कार्यक्रम के तहत, नागरिकों को उनके कानूनी अधिकारों, कर्तव्यों और हकों को जानने, समझने और उनका लाभ उठाने का अधिकार दिया जाता है। 28 फरवरी, 2025 तक, दिशा योजना ने अपने विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से देश में लगभग 2.10 करोड़ लाभार्थियों को कवर किया है।

भारत सरकार राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण के माध्यम से एक अन्य केंद्रीय क्षेत्र योजना, कानूनी सहायता बचाव परामर्श प्रणाली (एलएडीसीएस) को लागू कर रही है। एलएडीसीएस योजना का उद्देश्य केवल विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 की धारा 12 के अंतर्गत कानूनी सहायता के लिए पात्र लाभार्थियों को आपराधिक मामलों के संबंध में कानूनी सहायता प्रदान करना है।

एलएडीसीएस योजना का स्वीकृत वित्तीय परिव्यय 3 वर्षों (वित्त वर्ष 2023-24 से वित्त वर्ष 2025-26) के लिए 998.43 करोड़ रुपये है। 30 दिसंबर, 2024 तक, देश भर के 654 जिलों में एलएडीसी कार्यालय कार्यरत हैं और इनमें 3448 बचाव परामर्शदाताओं सहित 5251 कर्मचारी कार्यरत हैं। वर्ष 2024-25 (दिसंबर, 2024 तक) के दौरान, एलएडीसीएस कार्यालयों ने 3.95 लाख से अधिक आपराधिक मामलों का निपटारा किया।

लोक अदालतों का आयोजन विधिक सेवा संस्थानों द्वारा ऐसे अंतरालों पर किया जाता है, जैसा कि वे उचित समझते हैं, ताकि अदालतों में लंबित मामलों की संख्या को कम किया जा सके और विवादों को मुकदमेबाजी से पहले के चरण में ही निपटाया जा सके। लोक अदालतें अदालतों पर बोझ कम करने के लिए वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्र के प्रभावी तरीकों में से एक हैं, जिन्हें जनता से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली है।

लोक अदालतें तीन प्रकार की होती हैं: राज्य लोक अदालतें, राष्ट्रीय लोक अदालतें और स्थायी लोक अदालतें।

ए.   राज्य लोक अदालतों का आयोजन विधिक सेवा प्राधिकरणों/समितियों द्वारा स्थानीय परिस्थितियों और आवश्यकताओं के अनुसार मुकदमे-पूर्व और मुकदमे-पश्चात दोनों प्रकार के मामलों के निपटारे के लिए किया जाता है।

बी.  भारत के सर्वोच्च न्यायालय से लेकर तालुक न्यायालयों तक सभी न्यायालयों में मामलों (मुकदमेबाजी से पहले और मुकदमेबाजी के बाद) के निपटारे के लिए तिमाही आधार पर एक ही दिन राष्ट्रीय लोक अदालतें आयोजित की जाती हैं। राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण हर साल राष्ट्रीय लोक अदालतों के आयोजन के लिए कैलेंडर जारी करता है। वर्ष 2025 के दौरान, राष्ट्रीय लोक अदालतें 8 मार्च, 10 मई, 13 सितंबर और 13 दिसंबर को आयोजित की जानी हैं।

सी.  स्थायी लोक अदालतें अधिकांश जिलों में स्थापित स्थायी प्रतिष्ठान हैं, जो सार्वजनिक उपयोगिता सेवाओं से संबंधित विवादों के निपटारे के लिए अनिवार्य पूर्व-मुकदमेबाजी तंत्र प्रदान करते हैं।

विधि एवं न्याय मंत्रालय के राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) तथा संसदीय कार्य मंत्रालय में राज्य मंत्री श्री अर्जुन राम मेघवाल ने आज राज्यसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में यह जानकारी दी।

Tags: Arjun Ram MeghwalFree legal services
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